इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एकल पीठ के न्यायमूर्ति डॉ. योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के अंतर्गत एक बारंबार उठने वाले एवं महत्वपूर्ण प्रश्न का प्राधिकारिक रूप से निराकरण करते हुए अभिनिर्धारित किया है कि जहाँ मकान मालिक एवं किरायेदार के मध्य संबंध स्वीकृत अथवा अन्यथा स्थापित हो, वहाँ केवल लिखित किरायेदारी अनुबंध के अभाव मात्र से किराया प्राधिकरण का अधिकार क्षेत्र अपवर्जित नहीं होता।
संविधान के अनुच्छेद 227 के अंतर्गत दायर दो याचिकाएँ, झाँसी स्थित किराया प्राधिकरण के समक्ष मकान मालिकों द्वारा संस्थित बेदखली कार्यवाहियों से उत्पन्न हुईं। प्रथम प्रकरण में मकान मालिक ने एक व्यावसायिक किरायेदार की बेदखली की माँग की, जो मासिक ₹3,000/- किराये पर माह-दर-माह आधार पर कब्जे में था। द्वितीय प्रकरण में पूर्ववर्तियों के माध्यम से किरायेदारी का दावा करने वाले किरायेदार के विरुद्ध चूक एवं व्यक्तिगत आवश्यकता के आधार पर बेदखली की कार्यवाही की गई। दोनों प्रकरणों में किरायेदारों ने प्रारंभिक आपत्ति उठाई कि चूँकि पक्षकारों के मध्य कोई लिखित किरायेदारी अनुबंध विद्यमान नहीं है, अतः किराया प्राधिकरण के समक्ष कार्यवाही पोषणीय नहीं है तथा मकान मालिकों को प्रांतीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 के अंतर्गत लघुवाद न्यायालय का आश्रय लेना चाहिए। किराया प्राधिकरण एवं किराया न्यायाधिकरण, दोनों ने इन आपत्तियों को अस्वीकार कर दिया, जिन्हें तत्पश्चात् उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ताओं (किरायेदारों) ने यह अभिकथन किया कि अधिनियम, 2021 केवल धारा 4 के अंतर्गत प्रस्तुत लिखित किरायेदारी अनुबंधों के माध्यम से ही संचालित होता है तथा धारा 38(2) के अंतर्गत किराया प्राधिकरण का क्षेत्राधिकार केवल ऐसे पंजीकृत अनुबंधों तक ही सीमित है। अमित गुप्ता बनाम गुलाब चन्द्र कनोड़िया एवं रमन अरोड़ा बनाम सुशील कुमार निर्णयों पर आश्रय लेते हुए समन्वयक पीठों के निर्णयों में मतभेद का उल्लेख करते हुए वृहत् पीठ को संदर्भित किए जाने की प्रार्थना की गई।
प्रतिवादियों (मकान मालिकों) ने तर्क प्रस्तुत किया कि अधिनियम में कहीं भी मौखिक किरायेदारी को अपवर्जित नहीं किया गया है, धारा 4 नियामक प्रकृति की है न कि क्षेत्राधिकारीय, तथा एक बार मकान मालिक-किरायेदार संबंध स्वीकृत हो जाने पर किराया प्राधिकरण का क्षेत्राधिकार विफल नहीं किया जा सकता। विशाल रस्तोगी बनाम किराया नियंत्रक एवं कैनरा बैंक शाखा कार्यालय बनाम अशोक कुमार निर्णयों पर निर्भरता रखी गई।
उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अलिखित किरायेदारियों के प्रकरणों में भी अधिनियम, 2021 के अंतर्गत कार्यवाही की पोषणीयता का समर्थन करते हुए यह प्रकाश में लाया कि उच्चतम न्यायालय ने लवेन्द्र सिंह मामले में उच्च न्यायालय के निर्णय को अपास्त कर दिया था, जिससे प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण प्रभावी रूप से अननुमोदित हो गया। यह भी रेखांकित किया गया कि उत्तर प्रदेश विधानमंडल ने अधिनियम, 2021 की धारा 4(7) का निर्माण करते समय सचेत रूप से मॉडल किरायेदारी अधिनियम में विद्यमान निरोधक खण्ड को सम्मिलित नहीं किया।
न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 4 नियामक, साक्ष्यात्मक एवं सक्षमकारी प्रकृति की है — यह क्षेत्राधिकार की पूर्व-शर्त नहीं है। न्यायालय ने किरायेदारी के प्रमाण एवं किरायेदारी के अस्तित्व के मध्य एक सुनिश्चित एवं सारवान् अंतर स्थापित किया तथा अभिनिर्धारित किया कि स्वीकृत मकान मालिक-किरायेदार संबंध को केवल औपचारिक प्रलेखन के अभाव के आधार पर विलुप्त नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने आगे यह भी अवलोकन किया कि किरायेदार का तर्क स्वीकार करने पर एक विधिक उपचारीय रिक्तता उत्पन्न होगी — लिखित अनुबंध के अभाव में किराया प्राधिकरण का क्षेत्राधिकार अपवर्जित होगा, जबकि धारा 38(1) के अंतर्गत दीवानी न्यायालय भी एक साथ वर्जित होंगे — जो एक ऐसा परिणाम है जिसकी विधायिका ने कभी परिकल्पना नहीं की थी।
वृहत् पीठ को संदर्भित किए जाने की प्रार्थना के संदर्भ में न्यायालय ने अस्वीकृति व्यक्त करते हुए अभिनिर्धारित किया कि अमित गुप्ता एवं रमन अरोड़ा में लघुवाद न्यायालय की कार्यवाहियों की उत्तरजीविता का प्रश्न विचाराधीन था, जबकि अमरजीत सिंह एवं कैनरा बैंक में किराया प्राधिकरण के क्षेत्राधिकार के विस्तार का प्रश्न सीधे उठा था — ये दोनों भिन्न, यद्यपि परस्पर सम्बद्ध, विधिक अन्वेषण हैं, जिनके अनुपात निर्णयों में कोई अनसुलझा विरोधाभास नहीं है।
Case Details: M.A. 227 No. 5153 & 5155 of 2026
Bench: Hon'ble Dr. Yogendra Kumar Srivastava, J.
Petitioners: Akhilesh Kumar & Smt. Suman Dwivedi
Respondents: Sanjay Sahgal & Sanjeev Sahani & Anr.
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